Wednesday, February 12, 2014

बुझती लौ


कभी एक शाम ढले तो
डूबते सूरज की बिखरती
लाली, काश तुम्हे मेरी आखों
में उतरती आ जाये नज़र.
बरसों बीते इस आस में
काश तुम्हारी एक मुस्कान में
हो एक नाम मेरा भी.
मैं तो पिया राहों में
तुम्हारी, छोड़ आई थी
दिल कहीं  अपना।
दिन बीते, रातें बीतीं,
एक एक सिलवट गिनी है
मैंने बिस्तर पर अपने।
देखा है क्या तुमने कभी
चाँद  को ज़मीन से,
ऐसे ही देखती आयी हूँ
जाने कबसे तुम्हें मैं।
सूखी धरती के मानिंद,
तड़पी हूँ तुम्हारे नेह
की बरखा के इंतज़ार में. 
लहू से ख़त न लिखें हों
मैंने, पर हाँ दीवानगी तो
अपनी भी कुछ कम नहीं,
इन चिरागों की तरह एक दिन     
बुझ जायेगी लौ मेरी भी.
तब पिया तुम न सोचना यूँ
कि सवेरा तो हुआ है
मगर रौशनी तुम्हारी गली
में क्यूँ नहीं?
 

Friday, November 29, 2013

मिठास



आठ साल की थी झिलमिल. दीपावली का दिन था, अपने छोटी छोटी सी कलाइयों में चूड़ियाँ पहन रही थी वो. अपने रूप को दर्पण में निहार निहार कर खुश हो रही थी. सोच रही थी, अभी तैयार होकर बाहर निकलूंगी तो भैया बोलेंगे कि देखो आ गयी हमारी छोटी सी प्यारी सी राजकुमारी. हाँ, राजकुमारी, परी, शहज़ादी,भैया तो ऐसे ही नामों से उसको पुकारते थे न. और फिर आज तो उसका जन्मदिन भी था. आठ साल पहले ऐसे ही एक दीपावली के दिन पैदा हुयी थी वो. माँ ने उसकी नन्ही सी आखों में झिलमिलाते हुए दीपकों की  रौशनी को देखकर उसका नाम ही झिलमिल रख दिया था.  आज खूब मिठाई खाऊँगी, कोई मना भी नहीं कर पायेगा, सालगिरह जो है मेरी.

आठ साल बाद........

झिलमिल चुपके चुपके बैठी जलेबियाँ खा रही थी. मिठाई उसको इतनी पसंद थी, कि उसका मन ही नहीं भरता था कभी मीठा खाने से. मिठाई चोर के नाम से बदनाम हो गयी थी आस पड़ोस में. सब के सब त्यौहार पे उस से मिठाई छुपा कर रखते थे. वो कहती थी कि देखो कान्हा माखन चुराते थे, मैं अगर थोड़ी सी मिठास इस दुनिया से चुरा लूं तो क्या हो जायेगा? भैया कहते थे कि इतनी मिठास अपने अन्दर घोली हुए है उसने कि जब बोलती है तो भी मिश्री भरी बातें ही कहती है. अब खैर, भैया तो वैसे भी उस पर जान छिड़कते थे.  तभी अचानक उसने देखा कि पड़ोस वाले काका ने उसको जलेबी चोरी से खाते हुए देख लिया है. वो तुरंत बोली कि काका मैं माँ को बोलूंगी वो आपको पैसे दे देंगी इस मिठाई के. पर काका तो बड़े प्यार से मुस्कुरा के बोले कि अरे नहीं तुझे मिठाई पसंद है तो तू और खा, मैं देता हूँ. फिर वो अन्दर से रबड़ी लेकर आ गए.  अब तक झिलमिल ने ऐसी ख़ुशी, ऐसी मिठास के बारे में बस सुना था कि जिसको खाने से ख़ुशी के मारे बेहोशी हो जाती है. उसकी भी पलकें बंद होने लगीं.

जब पलकें खुली तो दर्द का एहसास हुआ, वो उठी, तो खून से चादर लाल थी, जब उसे समझ आया कि क्या हुआ है, तो उसकी आखों में झिलमिलाने वाली रौशनी बुझ गयी, एक ऐसी बाढ़ आई आंसुओं की. वो रोते रोते कह रही थी कि झूठ बोलते हैं वो जो कहते हैं कि नीम के पत्ते को शहद में डुबोने पर भी वो कड़वा ही रहता है. मिठास के पीछे छुपे ज़हर को नहीं पहचान पाई वो, जिसको रबड़ी के साथ खा लिया था. सच,  मिठास ने छला  था आज उसको.
फिर हर दीपावली को भैयया सोचते थे कि मेरी परी ने मिठाई को हाथ भी नहीं लगाया?

Thursday, August 15, 2013

संदेसा......



खामोश सी, चुपचाप
बैठी है, नज़रें आसमान
पर टिकाये हुये.
इन बादलों की अठखेलियाँ, 
इस पुरवा की ठंडक
सब से है वो अनजान सी।

ढूँढती है दूर किसी
कोने में, इस अनंत नभ के
किसी टुकड़े पर, शायद उकेर
गया हो कोई, नसीब उसका कहीं
क्योंकि हाथ की लकीरें पड़ीं धुंधली,
अब तो माथे की सिलवटें चुभती हैं.

कभी तो है टटोलती अपनी मन को,
कभी ह्रदय- सागर में मोती खोजती है,
अंतरात्मा भी जब पुकारने पर गूंगी हो जाती है,
क्षितिज पर उगते सूरज से ही वो
राह अपनी रोशन कर लेना चाहती है.

हाँ! खुद के भीतर एक शोर सा उठता है,
ये कैसी ध्वनि वह खुद ही समझ न पाती है,
यकायक एक पुराने आईने के पीछे से, एक
छवि उसको ताकती है,  शंखनाद की उस
 आवाज़ में संदेसा कुछ सुनाई तो देता है.


Thursday, May 9, 2013

वो शब्द....





कागज के कोरेपन को अपनी 
बनावट से स्याह करता वो शब्द, 
उस शब्द में सिमटी थीं, 
जाने कितनी यादें, बातें,
सिसकियाँ, मुस्कुराहटें, 
वो रंग, वो खुशबुएँ.
अतीत के उस पन्ने पर लिखा
वो शब्द और कुछ नहीं,
नाम था तुम्हारा.

Friday, February 15, 2013

प्रेमोत्सव




आज वैलेंटाइन दिवस है, जिसको हमारे देश में भी प्रेम दिवस की शक्ल में पहचाना जाने लगा है। अब आपको अपने आस पास ऐसे कई लोग मिल जायेंगे जो आज के दिन या तो गुमसुम बैठे होंगे कि उनकी ज़िन्दगी में तो कोई प्रेम करने वाला/ वाली ही नहीं, या कुछ ऐसे भी होंगे जो अपने इस दुःख को एक दम्भी हँसी के पीछे छुपाये बैठे होंगे और गाते फिर रहे होंगे की हम तो अकेले हैं, सो प्रेम के साथ जो झंझट मुफ्त मिलते हैं वो हमको नहीं हैं, तो जी हम इस बात की ख़ुशी मनाएंगे। 

मैं सबसे कहना चाहती हूँ कि प्यार तो दुनिया में हर तरफ बिखरा पड़ा है, बस हम ही उसको महसूस नहीं करते। हमने अपने अन्दर के सब खिड़की दरवाज़े बंद कर रखे हैं और प्यार खटखटाता रहता है, पर हम सुनते नहीं, और उस बेचारे को हम तक पहुँचने का कोई जरिया भी नहीं मिलता। अजीब लगा पढ़कर? कह दो की नहीं, तुम फ़ालतू बात कर रही हो। पर एक बार ज़रा ये सोचकर देखो कि  जिस हवा में तुम साँस ले रहे हो, जिस रौशनी में सब कुछ देखते हो, क्या वो भगवान् का बरसाया हुआ प्यार नहीं तुमपर? ये प्रकृति हमसे इस कदर प्रेम करती है कि  हम उसको कब से दुहते आ रहे हैं, लूटते आ रहे हैं, तब भी हमें फूल देती है, फल देती है, खनिज, अन्न सब तो देती है। हमारे माता पिता, जिहोने हमें इतने प्यार से पाल पोस कर बड़ा किया है, क्या वो भूल सकता है कोई? हमारा परिवार, हमारे दोस्त सब जो हमको गिरते ही संभालने आ जाते है, प्यार ही तो करते हैं हमसे। 

हाँ, मानती हूँ की उस उल्फत की जगह कुछ ख़ास होती है दिल में, पर प्यार तो अब भी है हमारी ज़िन्दगी में। बल्कि, मैं तो कहती हूँ कि ज़िन्दगी प्यार के रंगों से रंगी हुयी एक तस्वीर है। हमारा कर्तव्य है की हम जो प्यार इस जहाँ से हासिल करते हैं, वो प्यार इस दुनिया को, उन सबको वापिस उतनी ही शिद्दत से दें। प्यार के इस लेन- देन के बीच कभी तो वो पल भी आएगा जब हमको वो मुहब्बत  हासिल होगी जो हमें मुक्कमल बना दे। पर तब तक, प्यार का ये उत्सव मनाते रहो!

Saturday, February 9, 2013

फूल का सवाल



खिला है जो आज,कल वो भी
 मुरझा के झर जायेगा,
उसकी कोमल सी पंखुड़ियां
तिनका तिनका बिखर जायेंगी,              
हवा में न रहेगी उसकी भीनी सी
वो खुशबू , धूल संग कुचला जाएगा।

शायद बाकी रहें कुछ तसवीरें
या शायद किसी किताब के
पन्नों में बस जाए उसकी महक,
पर पूछे कुसुम सवाल ये ,
कि ओ माली, जब इसी मिटटी
में था मिलाना, तो क्यों दिया
ये रूप, क्यों दी सुगंध, जब
दो पल में सब है छीनना ?

मुस्कुराते माली ने कहा की अरे
पगले, यही तो नियम है, खिलकर
 मुरझाना, हाँ, यही तेरी नियति भी।                            
सवाल जो तूने पूछा है, तो जवाब भी सुन।
अपने दो पलों में तू इसी रूप, इसी
खुशबू से, दुनिया को खूबसूरत बनाता है,
उदास चेहरों पे मुस्कानें लाता है,
यही दो पल हैं तेरे पास पर तू यादें
बनकर जिए जाता है।

खिल तू कुछ इस तरह कि
दूर दूर तक फैले तेरी खुशबू,
खिल कुछ इस तरह कि नए
खिलते फूलों को तुझसे सीख मिले,
फिर मिटकर भी तू रहेगा अमर।