Saturday, May 12, 2012




भाषा तो नहीं समझ  सकता 
पर आवाज़  समझता हूँ, 
शब्द तो मेरी जुबां बना नहीं 
सकती, भले ही कहना हो 
बहुत कुछ. 

कह पाता अगर तो मैं 
भी कहता, ये कि प्यार 
करता हूँ तुमसे, बहुत, 
तुम्हारी सलामती के आगे, 
मेरी जान की कीमत है बहुत 
थोड़ी सी, ये कि तुम्हारे दर्द 
में चुभन मुझे भी होती है.

कि तुम्हारा लाड़ चाहता हूँ मैं 
ज़िन्दगी है मेरी छोटी सी , 
उसी में प्यार बटोरना है,
उसी में प्यार जताना है, 
बस उम्मीद है यही, 
समझतें हो तुम वो बातें,
जो मैंने कही नहीं.

Wednesday, May 9, 2012

वो बचपन


वो साबुन के बुलबुले थे 
कि थे गोल गोल  इन्ध्र्धनुष, 
वो सावन के झूले जब छूते 
आसमान, तो उड़ लेती थी 
मैं भी चमकीले पंख लगा .
वो मुस्कानें थीं मेरा बचपन 

वो बर्फ का गोला था जैसे 
गर्मियों की दोपहर की पहचान 
बरसात के पानी में गली पार 
करती मेरी कगाज़ की नाव,
बन जाती मेरी शान.
वो पल थे मेरा बचपन .

मिटटी की गुल्लक थी मेरा 
खजाना, जब झूठ बोलने पे 
कौवे के काटने का डर लगता था ,
निराले थे वो दिन, जो मन में 
अब बसते हैं बनकर मीठी यादें.
वो नन्हे मन की ख्वाहिशें थीं  
मेरा  बचपन.
 
ढूँढती हूँ जिसकी आहटें मैं 
कभी कभी हर कहीं,
वो था मेरा बचपन .

Saturday, April 21, 2012

Inspired



The sun is slowly going to
 its bed in the west skies,
The day is beginning to
end, the dusk  here lies.

But today was not just
another date in my calendar.
Today I have an inspiration,
lingering,like my lotion's lavender.

This little spark,oh I know
into a raging inferno, will blossom
I now have a desire, a longing,
my heart leaps under my bosom.

The moon now shines above
but, within me it is a new day.
It looked plain, but it was special,
for it was today, that I was inspired






Tuesday, April 17, 2012

सन्नाटा और हँसी



होठों के पीछे छुपी बैठी 
है मेरे मन की ख़ुशी 

लबों से छलकने को है तरसती 
मेरी हँसी, पर करूँ  क्या 

बाहर तो सन्नाटा है 
सब खुद में मगन हैं

ठहर कर सुने कोई 
किसी को वक़्त कहाँ है 

इस सन्नाटे को चीरती मेरी 
हँसी सबको शोर लगती है 

मैंने कहा खुश  हूँ तो घनी 
रात भी मुझे भोर लगती है 

Thursday, March 29, 2012

रात



अब रात ढल गयी है 
चल कुछ ख्वाब तू
बुन ले, कि क्या पता है 
दिन के उजाले में, 
यही ख्वाब हकीकत बन जाएँ 

Wednesday, March 28, 2012

इन्द्रधनुष



आँखों में पलते सपनों 
में रोज़ भरती हूँ रंग 
कुछ हलके, कुछ गहरे 
कभी सादे, कभी सुनहरे 
सपनों का ये झुरमुट 
पलकों तले तैरता है 
यूँ , जैसे हो कोई  इन्द्रधनुष 

सुनती हूँ मैं नगमे अक्सर 
कोई मीठा, कोई मद्धम 
कुछ में छलके ख़ुशी 
कोई बयान करे गम 
धुनों का ये संगम 
है जैसे बूंदों संग 
बरसता कोई इन्द्रधनुष 

एक किस्सा लिख रही हूँ
पल पल जीकर ये ज़िन्दगी 
झेली है मैंने तपिश भी 
चखा है छाँव को भी 
ये मेरा जीवन भी तो 
है जैसे आसमान के सीने 
पे बिखरता कोई इन्द्रधनुष 

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